एक सच्ची भक्ति:
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एक दिन की बात है सुदामा जी भगवन श्री कृष्ण से मिलने गए. मिले भी और साथ में दो चार दिन वहां ठहरे भी. जब सुदामा जी भगवन कृष्ण के यहाँ पहुंचे तो भगवन ने उन से पूछा की भाबी ने मेरे लिए क्या दिया था और तब सुदामा जी ने बहुत ही मुस्किल से चावल से बनाए हुए प्रसाद भगवन श्री कृष्ण को दिए. भगवन कृष्ण ने प्रसाद खाते ही सुदामा के आर्थिक स्थिति से परिचित हो गए. कुछ दिन बाद सुदामा जी बोले की कन्हैया मैं अब चलता हूँ तेरी भाबी अकेले होगी. भगवन श्री कृष्ण सुदामा जी को जाने की अनुमति दे दिए और सुदामा जी चल परे. जब सुदामा जी अपने गाम में आए तो हैरान हो गए पूरा गाम बदला हुवा था. सुदामा जी को लगा सायद मैं किसी दुसरे गाम में आ गया. लोगो से पूछा की भिया कौन सी नगर है ऐ अतो लोगो ने बताया सुदामा नगर है तो सुदामा जी को पहले लगा कोई राक्षश ओगरा होगा सुदामा नाम का जिसने ऐ नगर बनबाया हो. तब तक सुदामा जी के घर बालो का पता चला की सुदामा जी आ गए है तो उन्होंने नोकर चाकर को भेजा जाओ उन्हें आदर से ले आओ. सुदामा जी जब अपने महल के पास आ गए और उन की पत्नी जब उन के सामने आई तो सुदामा जी उन्हें पहचान नहीं पाए और बोले देवी आप दूर से ही बात करे. पर जब वो देवी ऐ बोल कर सुदामा जी को घर ले गई की मैं आप की पत्नी हूँ तो सुदामा जी को काफी आश्चर्य हुवा.
"सुदामा जी ने अपने पत्नी से पूछा की आखिर ऐ कैसे हुवा तो उनकी पत्नी ने बताई की एक मुंशी आया और हमें बताया की ऐ महल और ऐ नगर सब अब आप ही का है. सुदामा जी पूछे कहाँ है वो तो पत्नी बोली की बाहर बालकोनी में है. जब सुदामा जी उन्हें देखे तो सन्न रह गए की ऐ तो कृष्ण है भेष बदल कर आया है. गले मिले बात चित किए और फिर सुदामा जी उस महल के सामने जो उनका झोपरी था उसी में चले गए और फिर महल में कभी पाव नहीं रखे. वो बोले कृष्ण मुझे तो तेरा भक्ति चाहिए ऐ महल अटारी नहीं. तब भगवन कृष्ण उन को गले से लगा कर रो परे."
"काश इसी तरह की मधेश भक्ति हमारे मधेशी नेताओ में भी होता"
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एक दिन की बात है सुदामा जी भगवन श्री कृष्ण से मिलने गए. मिले भी और साथ में दो चार दिन वहां ठहरे भी. जब सुदामा जी भगवन कृष्ण के यहाँ पहुंचे तो भगवन ने उन से पूछा की भाबी ने मेरे लिए क्या दिया था और तब सुदामा जी ने बहुत ही मुस्किल से चावल से बनाए हुए प्रसाद भगवन श्री कृष्ण को दिए. भगवन कृष्ण ने प्रसाद खाते ही सुदामा के आर्थिक स्थिति से परिचित हो गए. कुछ दिन बाद सुदामा जी बोले की कन्हैया मैं अब चलता हूँ तेरी भाबी अकेले होगी. भगवन श्री कृष्ण सुदामा जी को जाने की अनुमति दे दिए और सुदामा जी चल परे. जब सुदामा जी अपने गाम में आए तो हैरान हो गए पूरा गाम बदला हुवा था. सुदामा जी को लगा सायद मैं किसी दुसरे गाम में आ गया. लोगो से पूछा की भिया कौन सी नगर है ऐ अतो लोगो ने बताया सुदामा नगर है तो सुदामा जी को पहले लगा कोई राक्षश ओगरा होगा सुदामा नाम का जिसने ऐ नगर बनबाया हो. तब तक सुदामा जी के घर बालो का पता चला की सुदामा जी आ गए है तो उन्होंने नोकर चाकर को भेजा जाओ उन्हें आदर से ले आओ. सुदामा जी जब अपने महल के पास आ गए और उन की पत्नी जब उन के सामने आई तो सुदामा जी उन्हें पहचान नहीं पाए और बोले देवी आप दूर से ही बात करे. पर जब वो देवी ऐ बोल कर सुदामा जी को घर ले गई की मैं आप की पत्नी हूँ तो सुदामा जी को काफी आश्चर्य हुवा.
"सुदामा जी ने अपने पत्नी से पूछा की आखिर ऐ कैसे हुवा तो उनकी पत्नी ने बताई की एक मुंशी आया और हमें बताया की ऐ महल और ऐ नगर सब अब आप ही का है. सुदामा जी पूछे कहाँ है वो तो पत्नी बोली की बाहर बालकोनी में है. जब सुदामा जी उन्हें देखे तो सन्न रह गए की ऐ तो कृष्ण है भेष बदल कर आया है. गले मिले बात चित किए और फिर सुदामा जी उस महल के सामने जो उनका झोपरी था उसी में चले गए और फिर महल में कभी पाव नहीं रखे. वो बोले कृष्ण मुझे तो तेरा भक्ति चाहिए ऐ महल अटारी नहीं. तब भगवन कृष्ण उन को गले से लगा कर रो परे."
"काश इसी तरह की मधेश भक्ति हमारे मधेशी नेताओ में भी होता"
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