Tuesday, 26 June 2012

मधेश के जागरूक व्यक्तियों से अपील


मधेश के जागरूक व्यक्तियों से अपील:@ मधेशी एकता

                                यह बहुत ही दुःख की बात है की मधेश के जागरूक व्यक्ति मधेशी कौम के सदस्यों के प्रति हो रहे अत्याचारों के खिलाफ एकजुट होते नहीं दिखाई देते. ऐसा सोचना सरासर गलत है की किसी के परेशानी से किसी दुसरे को क्या मतलब ? ऐसा सोचना मधेशी कौम के प्रति विश्वासघात करना है. एक से दुसरे - तीसरे बढ़ते बढ़ते सम्पूर्ण समूह पर परेशानी आ परती है. उदहारण आप के सामने है. की थारू को मधेशी से अलग कर कुछ ही दिन पहले जगह जगह थारू आन्दोलन कारी को मारा और पिटा गया है. इसलिए मधेश के किसी भी  जिले में कहीं भी किसी  व्यक्ति विशेष या समूह के साथ हो रहे अन्याय का जमकर विरोध करना मधेश के हर क्षेत्र के व्यक्तियों का कर्तव्य है. एक जिल्ले के लोगो को दुसरे जिल्लो के लोगो के पास पहुँच कर मुसीवत में फंसे लोगो की मदत जी जान से करनी चाहिए. एक स्वर में डटकर विरोध करना चाहिए ताकि चोर नोकरशाही तथा लोक शाही का अनुचित गलत आतंक जनता पर फैलने नहीं पावे.                        

                            चुकी मधेश पर मधेशिओं का शासन नहीं है, मधेश की न तो रास्ट्रीय पुलिश है, न फौज न कानून के निर्माता, न इन्सफ्कर्ता, न मधेशिओं का अपनी भाषा में वयान लिखने का अधिकार है.इसलिए अब तो जागो मधेशी युवा दोस्तों. अभी नहीं तो कभी नहीं आपने तो सुना ही होगा. अपने जात पात से ऊपर उठकर मधेश और मधेश वाशिओं के अधिकार के प्राप्ति के लिए जागो. हमें अपना अधिकार लेना है. हमें अपना अधिकार चाहिए भी. इस के लिए हमें एक जुट होना परेगा  दोस्तों. आओ हमारे साथ आओ और मिलकर वजाते है बिगुल अपना अधिकार के लिए.                              

                            मधेशिओको अपनी शासन और अपनी अधिकार तभी मिल सकती है जब हम लोग आपस में वैर को मिटाकर एकजुट होकर नौकशाही को ठीक रास्ते पर लाने के लिए ठोस कदम उठावे. हाथ पर हाथ रखकर वैठे रहने से काम चलने वाला नहीं है. परमात्मा भी उसी की मदत करते है जो अपनी मदत खुद करते है. मधेश के किसान, मजदूर , जमींदार , व्यपारी , उधोगपति , डाक्टर , शिक्षक , विधार्थी , वकील विभिन्न पेशो  में लगे व्यक्तिओं को अपने ऊपर हुए अत्याचार समझे और एक दुसरे की सहायता के लिए फ़ौरन नजदीक आ जाय. शक्तिविहीन मधेशी जनता इसी तरह मधेशी कौम के दुस्मानो से मुकवाला कर सकती है.......जय मधेश और मधेश जिंदाबाद........

Sunday, 24 June 2012

मधेश शिक्षा भाग -१


मधेश शिक्षा भाग -१ 
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मधेश शब्द संस्कृत के मध्य देश शब्द का अपभ्रंश है जिस का अर्थ है बिच का देश. बिच का देशो से तात्पर्य आर्यों से बसे भूमि भाग अर्थात आर्याबर्तके बिच का देश से है. नेपाल के लोगो ने मध्यदेशीय शब्द को मधेसिया या मधेशिया शब्दों में तथा मध्यदेश शब्द को मधेस व मधेश शब्दों में परिणत किया है.नेपाल सरकार के हिसाब से मधेश का जनसँख्या नेपाल का ५२% तथा इस का क्षेत्रफल १६००० बर्ग मिल है.
      भगवन बुध और राजा जनक दोनों मधेशियों के संतान है. नेपाल के मधेश क्षेत्र जो मध्यदेश के प्राचीन जनपद पंचाल कोशल कशी एवं मिथिला का उत्तरी हिस्सा में ही विश्व वंध भगवन बुद्ध की पावन जन्मभूमि लुम्बिनी तथा जगत जननी जानकी की पवित्र जन्मभूमि जनकपुर भी है.
      नेपाल के मधेश क्षेत्र की ग्रामीण बोलिया मुख्यतः पूरब में मैथिलि मध्य में भोजपुरी एवं पश्चिम में अवधी, कन्नोजी, वज्र तथा गढ़वाली कुमौनी से मिलती जुलती बोलिया है. सम्पूर्ण मधेश क्षेत्र की साहित्यिक भाषा हिंदी है और साथ ही यहाँ के शिष्ट लोग अपने बिचारो की अभिब्यक्ति हिंदी में ही करते है तथा मधेश क्षेत्र के सभी राजनैतिक पार्टियों के अपने प्रचार कार्य हिंदी में ही हुवा करते है.
       नेपाल के तत्कालीन राजा पृथ्वी नारायण शाह ने अपने गोरखा राज्य का बिस्तर के क्रम में छल और कपट से मधेश क्षेत्र को भी अपने गोरखा राज्य में मिला लिया. तब से अब तक मधेशी लोग अपने अधिकार के लिए तरप रहे है. परतंत्र मधेश जिनकी संपूर्ण अधिकार आज तक छीने हुवे है, जिनकी न तो आज भी अपनी पुलिस है न अपनी सेना न अपने न्याय कर्ता न अपने कानून के बिधाता. मधेशी लोगो के साथ कठोरता पुर्बक ब्यवहार करते रहे होंगे जिसका परिणाम यह निकला की १८१४ के नेपाल ब्रिटिश युध्द में मधेशियों ने अंग्रेजो का साथ दे दिया. फलाश्वरूप समस्त मधेश क्षेत्र पर अंग्रेजो का अधिकार हो गया.
        तत्पश्चात चतुर अंग्रेजो ने मधेशी को जोरदार धोखा देते हुवे नेपाल पर अपना प्रभुत्वा रखने के लिए चालाकी से काम लिया.एक और तो अंग्रेजो ने मधेशी जनता के भविष्य की परवाह किए बिना नेपाली शासको को प्रसन्न रखने के उद्देश्य से विजित मधेश क्षेत्र के पूर्वी हिस्से को नेपाली शासको को देकर उनसे मित्रता प्राप्त कर ली.ब्रिटिश सरकार को जहाँ मधेशियों की देखभाल करनी चाहिए थी वहां उलटे उसने नेपाली शासको को पश्चिमी मधेश क्षेत्र को भी लौटा दिया वो महज इस लिए की राणा शासको की फौज ने भारत के सिपाही बिद्रोह को दबाने में अंग्रेजो की सहायता की थी.फिर भी १८६० इ की संधि के बाबजूद भी मधेशियों पर अत्याचार न करने की शर्त नेपाल सरकार पर कायम रही. लेकिन राणा शासक के एकतंत्री शासन ने मधेशियो के मिटटी में मिला दिया. पहाडियों, नेपालियो और मधेशियो के लिए अलग अलग कानून बने. मधेशियों का सारा अधिकार छिना गया. जमीं जयदात छिना गया. बाहरी दुनिया बालो के नज़रो से भी मधेश और मधेशी को छुपा कर रखा गया.
     सन १९४७ में ब्रिटिश भारत सरकार की साडी जिम्मेबारी भारतीयों के हाथ में आई. अंग्रेजो ने भारतीयों शासक के हैशियत से ही भारत की और से नेपाल के साथ सन १८१५-१६ इ की संधि की थी. उपरोक्त संधि के अनुसार मधेश क्षेत्र की जनता के साथ नेपाल सरकार का न्यायोचित ब्यवहार हो रहा है या नहीं जिसके लिए नेपाल सर्कार ने जिम्मेबारी स्वीकार की थी इसकी देखभाल के लिए बैधानिक तौर से भारत ही जिम्मेदार था.परन्तु भारत में १९५० इ की नेपाल भारत संधि के अनुसार इस जिम्मेदारी को एकदम ख़तम कर दिया गया.और इस तरह मधेश और मधेशी शोषण और गुमनामी की जिन्दगी जीने को मजबूर हो गया.
     कितनी बड़ी साजिस है नेपाली और नेपाल मूल के लोगो का मधेशी को दबाने की बात इस से पुष्टि होता है की जिस मधेशी समुदाय का जनसँख्या नेपाल सरकार के हिसाब से ५२ % से जादा है के बारे में दुनियां बालो को तो छोडो भारत सरकार तक को कोई खबर नहीं है. पर अब मधेशी युवा जाग रही है. मधेशी युवा को सब कुछ समझ में आने लगा है. अब वो दिन दूर नहीं जब मधेशी लोग अपना संपूर्ण अधिकार लेकर अमन और चैन की जिन्दगी जिएगी .........जय मधेश और मधेश जिंदाबाद ........

मधेश शिक्षा भाग -२
( मधेश का वीर सहीद रघुनाथ प्रसाद ठाकुर)

मधेश को नजदीक से जानने बालो द्वारा लिखित पर्चो पम्पलेट और पुस्तको के आधार पर मधेश और मधेशी का सच्चाई आप के सामने प्रस्तुत करने का उद्देश्य नेपाल या नेपाल सरकार के प्रति अनादर पैदा करवाना या आपसी वैमनष्य को बढ़ावा देना नहीं है. अपितु, मधेश और मधेशी का सही तथ्यों को समझने समझाने का पर्यास मात्र है.ताकि अब भी नेपाली लोग या नेपाली शासक वर्ग पूर्वाग्रह को भुलाकर यह समझे की मधेशियों की समाश्या जातीय समाश्या नहीं रास्ट्रीय समाश्या है.जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता है. क्योंकि मधेशिओं का हक़ अधिकार की आवाज़ उठानेबलो को अज्ञानता वश साम्प्रदायिकता की संज्ञा देते आया है. कइयो मधेश विरोधी लोगो का कहना है की कुछ साल पहले ऐ आवाज़ कहाँ थी? मेरा उद्देश्य उन भाइयो का समझाने का है की मधेशिओं की इस शास्वत आवाज़ का आभास उसी रोज से होता है जिस वक्त १८१४ इ में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सरकार नेपाल पर आक्रमण किया था. मधेशिओं की अपनी शासन नहीं थी, नेतृत्वा देने वाला नेता नहीं था. जनता अपने वारे में अंजान एवं अशिक्षित थी. उस लड़ाई में नेतृत्वा विहीन, असंगठित, मूक और असहाय अवाष्था में गोरखा शासक वर्ग तंत्र के जुल्म या अत्याचारों से पीड़ित मधेशी जनता अंग्रेजो के अधीन रहना पसंद किया और अंग्रेजो का साथ दिया.
                                        गोरखा सरकार के हाथ से मधेश और मधेशी जनता निकल जाने के कारण अपने भारदारो को पलने के लिए याचना करने पर अंग्रेजो द्वारा सालाना दो लाख रुपया प्राप्त किया करता था. बाद में अपने आप को अंग्रेजो का वफादार साबित करने के बाद ही अंग्रेजी शासक खुश होकर मधेश को पुनः गोर्खाली सरकार के हवाले करते हुवे सालाना देने बाले रकम को बंद कर दिया. देखिए ८ दिसम्बर १८१६ इ में महाराज धीरज गिरवान युद्ध वीर विक्रम शाहदेव अवं ब्रिटिश इंडिया कंपनी सरकार के विच हुई संधि की धरा (६) और (७).
                                         संधि की धरा (७) के मुताविक अंग्रेजो ने गोरखा धिस को मधेश के सुपुर्दगी के बाद बदले की भावना से अभिप्रेरित हो मधेशी जनता के साथ किसी तरह का अत्याचार नहीं करने के लिए रोक लगाई थी. क्योंकि पूर्व में  मधेशी लोग लड़ाई के वक्त गोरखाली सरकार को साथ न देकर अंग्रेजो के  साथ  मिल गए थे.
                               उसी मूक दबी हुई मधेशियों की शास्वत आवाजो का गहनतम अध्ययन करने के बाद ही १४४ वर्ष वाद प्रमाणिक एतिहंसिक एवं प्राचीन दस्तावेजो के अधर पर १९५८ इ से ही संगठित रूप से अहिन्शात्मक आन्दोलन का विगुल बजाते हुवे " रघुनाथ ठाकुर मधेशी" २०३८ साल ( २१-६-१९८१ इ ) में अमर शहीद हो गए.
                               अतः स्पष्ट शब्दों में वाता देना हमारा कर्तव्य होता है की मधेशी आम जनता अब किसी की मर्जी के मुताविक जीना चाहते है और भविष्य में जीना चाहेगा इस भ्रम को तो अपनी बुध्धि से अवश्य ही निकल दे तो अच्छा रहेगा.....जय मधेश और मधेश जिंदाबाद.